पशु अस्पताल बीमार, हो रही पशुधन की उपेक्षा

 मुजफ्फरपुर।      


 पशुधन की सुरक्षा एवं सुविधा के दावे की 'हवा निकल रही है। पशु अस्पताल बदहाल है। कहीं चिकित्सक तो कहीं कर्मियों का टोटा है। अस्पतालों में ताला लटका रहता है। उपचार नहीं होने से धीरे-धीरे अस्पतालों से पशुपालकों ने मुंह मोडऩा शुरू कर दिया है। उपचार के लिए निजी चिकित्सक व दवा दुकानें सहारा हैं। संसाधनों की कमी से भी पशु अस्पताल जूझ रहे हैं। अधिकारियों की कमी का आलम यह है कि एक के जिम्मे कई प्रखंड हैं। इस वजह से अधिकारी अपनी जिम्मेदारी सही से नहीं निभा पा रहे हैं। इसका खामियाजा पशुओं एवं पशुपालकों को भुगतना पड़ रहा है। कांटी के पशुपालक रमेश कुमार व औराई के मनोज महतो ने कहा कि पशु अस्पताल में उपचार नहीं होने की वजह से निजी चिकित्सक से इलाज कराना पड़ता है। शहर के प्रांतीय पशु अस्पताल में पशु शल्य चिकित्सा पदाधिकारी का पद रिक्त है। जनवरी 2021 में सेवानिवृत्त होने के बाद अब तक इस पद पर नियुक्ति नहीं हुई है। इसके अलावा 16 प्रखंडों में मात्र साहेबगंज, सकरा व मुशहरी में ही प्रखंड पशुपालन पदाधिकारी (बीएएचओ) हैं। इनके जिम्मे अन्य प्रखंडों की भी जिम्मेदारी है। वहीं 38 अस्पतालों में आठ में पशु चिकित्सक नहीं हैं। 

कोरोना को लेकर टीकाकरण की शुरू नहीं हुई सुगबुगाहट

पशुओं को गला घोंटू रोग से बचाने के लिए बरसात पूर्व होने वाले टीकाकरण की अब तक जिले में सुगबुगाहट नहीं है। कोरोना वायरस को लेकर पशु पालन मंत्रालय की ओर से अब तक कोई दिशा-निर्देश नहीं आया है। टीकाकरण जून में शुरू होता रहा है। जिला पशुपालन पदाधिकारी डॉ. सुनील रंजन सिंह ने कहा कि जिन अस्पतालों में चिकित्सक नहीं हैं वहां की जिम्मेदारी बगल के चिकित्सक को दी गई है। अस्पतालों में पशुओं का उपचार हो रहा है। उन्हें सरकार की तरफ से दी जा रही हर सुविधा दी जा रही है। 

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