कल्कि अवतार श्री श्री ठाकुर जी ने कहा है..

 


कल्कि अवतार श्री श्री ठाकुर जी ने कहा है दीक्षा, शिक्षा व सुविवाह को ठीक कर देने से सब कुछ ठीक हो जाएगा: नीरज निराला

डी एन कुशवाहा, पत्रकार, 

रामगढ़वा, पूर्वी चम्पारण, बिहार।

कल्कि अवतार युग पुरुषोत्तम परम प्रेममय श्री श्री ठाकुर जी प्रत्येक मानव को बचने- बढ़ने व हर परिस्थिति से उबरने तथा हर समस्या के समाधान के लिए महान अस्त्र-शस्त्र के रुप में यजन, याजन, ईस्टभृति स्वस्तययनी और सदाचार नियम प्रदान किए हैं। उक्त बातें सत्संग नेपाल बीरगंज द्वारा सहप्रति ऋत्विक अशोक कुमार चौरसिया के नेतृत्व आयोजित ऑनलाइन विश्व सत्संग परिवार को संबोधित करते हुए एसपी ऑफिस में मुंशी के पद पर कार्यरत व ठाकुर जी के परम भक्त नीरज निराला ने कही। उन्होंने कहा कि-

1.यजन मतलब होता है, अपने जीवन को उच्च आदर्श की ओर ले जाना। जीवन के हर क्षेत्र को समझना, अपने आपको जानना, अपना सर्वांगीण विकास करना। क्योंकि ठाकुर कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपने,अपने परिवार, अपने समाज, अपने राष्ट्र और विश्व के लिए उत्तरदाई है।

उसके लिए हमें ठाकुर के बताए गए रास्ते को अपनाने की जरुरत है जैसे- अध्यन, अध्यापन, दीक्षा, शिक्षा, सुविवाह, सुप्रजनन, सदाचार, सत्संग, संयम, साहस, इमानदारी, समय का महत्व तथा ध्यान इत्यादि चीजों पर कौशलता हासिल करने की जरुरत है। तब जाकर एक व्यक्ति का संपूर्ण जीवन प्रेरणादायक बन पाएगा। ठाकुर कहते हैं "योग्यता नहीं दाबी करे, दुर्गति में वही मरे।" ठाकुर कहते हैं मनुष्य को तरह से योग्य बनना बहुत जरूरी है। ताकि कभी भी दूसरे के आगे हाथ फैलाना नहीं पड़े। अर्थात् हर तरह से वे एक मनुष्य को सामर्थ्यवान बनाना चाहते हैं। आज कोई भी किसी पद पर आरूढ़ है, वह यजन का ही कमाल है। क्योंकि यजन हमें जगाता है।

2.याजन मतलब होता है, दूसरे व्यक्ति को ठाकुर के जीवन की वास्तविकता का परिचय कराना। हर तरह से उन्हें योग्य बनाना। सही दिशा और सही पथ पर चलने के लिए प्रेरित करना। अर्थात दूसरे के जीने-बढ़ने में सहायता प्रदान करना।

3.ईस्टभृति का मतलब होता है, मंगलमय देवता का भरण पोषण करना। उनके आदर्श को अपने जीवन में उतारना। ईस्टभृति पंच महायज्ञ है, जो आपको अकाल मृत्यु से बचाती है। क्योंकि हम सब दिन मंगल देवता को कुछ निवेदन करके ही भोजन ग्रहण करते हैं।

4.स्वस्तययनी हमें स्वस्थ रहने के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता है। हम अपने शरीर को ही श्री विग्रह का मंदिर मानकर उसका ख्याल रखते हैं, उसका देखरेख करते हैं, अपने आपको सहनशील बनाते हैं। जीवन में जो अच्छा काम नजर आता है उसे करने के लिए प्रेरित हो जाते हैैं। हर हमेशा दूसरे की मंगल कामना चाहते हैं। आर्थिक समस्या कैसे दूर होगा, उस पर काम करते हैं।

5.सदाचार से शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक संतुलन बना पाते हैं।

 शारीरिक सदाचार शरीर को स्वस्थ और मजबूत रखने का विधान है।जिसमें हम खानपान, एक्सरसाइज, योगा पर हमेशा ध्यान रखते हैं। क्योंकि स्वस्थ शरीर मनुष्य का सबसे बड़ी पूंजी है। मानसिक सदाचार से डिप्रेशन से हम बचते हैं। इसके लिए मेडिटेशन, सद्ग्रंथ पाठ, मोटिवेशनल ऑडियो-वीडियो, अच्छे लोगों की संगति, सत्संग, एजुकेशनल प्रोग्राम हमारी मानसिक संतुलन को स्वस्थ बनाता है।

अध्यात्मिक सदाचार से सृष्टि के परम सत्ता से हमें प्रेम होती है। ईश्वर,माता-पिता, गुरु और श्रेष्ठ जनों से हमें लगाव कराती है। अपनी जीवन में इन लोगों का तब महत्व समझ में आता है। मातृभक्त, पितृभक्त, गुरुभक्त, राष्ट्रभक्त मनुष्य बन पाता है।

मां से प्रेम मनुष्य को कृतिवान बनाता है, पिता से प्रेम सबके प्रति प्रेम जगाता है। गुरु भक्ति मनुष्य की वास्तविक जीवन से परिचय कराती है। जिसके जीवन में गुरु आ जाते हैैं, उसके ग्रह्-दोष का हमेशा खंडन होता रहता है।

        एक बार ठाकुर जी से मिलने के लिए गांधीजी और सुभाष चंद्र पहुंचे। उन्होंने ठाकुर से कहा कि मेरा देश आजाद हो जाएगा, मैं जानता हूं। पर आर्थिक समस्या आएगी। इसके समाधान के संबंध में आप कुछ बताएं। ठाकुर जी ने कहा दीक्षा शिक्षा और सुविवाह को ठीक कर देना सब कुछ ठीक हो जाएगा। क्योंकि दीक्षा अच्छी संस्कार प्रदान करती है, कौशलता प्रदान करती है।शिक्षा से हमारा सर्वांगीण विकास होता है और चरित्र का निर्माण होता है।

ठाकुर बोले विवाह को खेल नहीं समझना चाहिए। आज दहेज के कारण अच्छी लड़की कि अच्छा लड़का से शादी नहीं होती है। अच्छा लड़का का अच्छी लड़की से शादी नहीं होती है। लोग विवाह बैंड बजाकर करते हैं, लेकिन एक दिन जिसको विवाह करके ले जाता उसका ही बैंड बजा देता है। तरह-तरह की यातनाएं सहना पड़ता है, कईयों को जहर खाना पड़ता है।

अच्छा संतान चाहते हैं, देख सुन कर सुंदर विवाह करें ताकि सुप्रजनन हो। संस्कारी बच्चे आपके घर आएंगे तो आपकी कुल खानदान की मर्यादा रखेंगे।

एक बार देशबंधु चितरंजन दास को ठाकुर जी बोले कि तुम अब आश्रम में ही रहो, तो उन्होंने कहा था कि मुझे देश को आजादी दिलाना है।तब ठाकुर जी ने कहा कि अब तुम्हारी अवस्था वैसी नहीं है कि तुम  ज्यादा इधर-उधर कर पाओगे कुछ विश्वासपात्र लोगों को ढूंढ कर उसके हाथ कार्यभार सौंप दो। उन्होंने कहा ऐसा कोई विश्वास पात्र व्यक्ति नहीं मिलता है। उसके बाद ठाकुर जी ने कहा फिर इस देश को आजादी दिला कर किसके हाथ में कार्यभार दोगे ? यानी वे बार-बार कहते थे  कि मनुष्य को अच्छा बनाओ।

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