साहित्य और राजनीति

औराई(मुजफ्फरपुर)

लेख:-साकेत बिहारी(संपादक-www.inbnew.com& लिखते रहो)

कल्पना कीजिए कि, आपके पास पुस्तक है, जिसका कोई लेखक नहीं ! क्यूँकि, आप उसके लेखक को जानना ही नहीं चाहते। उसका उस पुस्तक को लिखने का इरादा आपके लिए अप्रासंगिक है, क्यूँकि आपके पास अपना एक एजेंडा है, जिसे आप उसपर थोप कर ही उसे पढ़ेंगे। और इस तरह, जैसे साहित्य का संवेदनाओं और मूल्यों से भरा पूरा एक संसार, आपके लिए महज़ एक वस्तु भर बनकर रह गया हो। साहित्यिक सिद्धांतों ने साहित्य से उसके अंतर्निहित मूल्यों का हरण कर लिया है । मानव समाज के उत्थान की दृष्टि से यह कतई मददगार साबित नहीं होगा।

दशकों पहले तक, आप किसी पुस्तक को अपने लिए पढ़ा करते थे, ना कि इसलिए, कि किसी और व्यक्ति का सिद्धांत उसके परिप्रेक्ष्य में आपसे क्या कहता है । यह एक तरह से ग़ुलाम साहित्य की भाषा होती। इससे किताबें आपसे बातें नहीं कर पातीं । आपका उनसे हृदय से संवाद नहीं बैठ पाता । आप उस किताब को अपनी सोंच के अधीनस्थ करते चले जाते, और समाज, तमाम तरह के क्रांतिकारी परिवर्तनों से वंचित रह जाता। साहित्य की ग़ुलामी असल में पूरे मानव समाज की ग़ुलामी की शुरुआत की सीढ़ी होती है ।

साहित्य की अपनी एक आनंदमयी दुनिया होती है ।हर समय इसे एक एजेंडे के साथ पढ़ना हमारी स्वयं की सोंचने की शक्ति को भ्रमित कर देता है ।किसी साहित्यिक कृति को किसी सिद्धांत के अधीनस्थ होकर पढ़ना, साहित्य की दुनिया में, सामाजिक यथास्थिति क़ायम करने जैसा है । जबकि, साहित्य और यथास्थितिवाद, परस्पर विरोधाभासी रहे हैं। ऐसे में अगर किसी एजेंडे को चलाने की मंशा से आप सदैव ग्रस्त रहते हैं, तो आपके लिए राजनीति का क्षेत्र है, साहित्य का नहीं। साहित्य का दायरा काफ़ी स्वतंत्र, विस्तृत और परिवर्तन की सम्भावनाओं से भरा होता है ।

एक महान साहित्य नैतिक यथार्थवाद को प्रस्तुत करता है, जो कि मानव जीवन की गरिमा, और स्वतंत्रता की बात करता है। साहित्य की उत्कृष्ट दुनिया में, हम चरित्रों को उनके नैतिक मूल्यों और आदर्शों से पहचानते हैं, और उन्हें हम यथार्थ में परिलक्षित करने की कोशिश करते हैं। साहित्य लोक में मानव जीवन या प्रकृति का नाटकीय चित्रण होता है, जो कि प्रेरक होने के साथ-साथ, काफ़ी सशक्त होता है, और साहित्य को परिवर्तनकारी सम्भावनाओं से भर देता है । यही कारण है कि बार-बार हम लौटकर किसी ख़ास पुस्तक को पढ़ते हैं ।और, यही कारण है की आप जब किसी पुस्तक के किसी चरित्र को काफ़ी क़रीब से जान चुके होते हैं; और तब, जब कोई उस चरित्र को किसी और ढंग से आपके सामने प्रस्तुत करने की कोशिश करता है, तो आप अपने मन के किसी कोने में अधीर हो उठते हैं।

वर्तमान काल में, साहित्य के साथ यही हो रहा है, जिससे कि विषय वस्तु विकृत सी प्रतीत होती है । ऐसा लगता है जैसे कोई साहित्यिक कृति चंद पन्नों पर टंकित कुछ शब्दों का समूह भर बनकर रह गयी हो। इस तरह से, समाज के मूल साहित्यिक चेतना से दूर होते जाने से, मानव समाज के लिए ख़तरनाक परिणाम हो सकते हैं ।

साहित्य जब खुद, एक गौरवपूर्ण स्वतंत्रत अस्तित्त्व से वंचित हो जाएगा, फिर यह मानव समाज को कैसे मुक्ति दिला पाएगा ? आज के दौर में तो ऐसा ही लगता है कि, दुनिया भर में लगातार बलशाली होती जा रही राजनीतिक सत्ता और यंत्रिक दुनिया के प्रभावक्षेत्र से साहित्य जब स्वयं को नहीं बचा पा रहा, तो मानव की स्वतंत्रता और गरिमा को क्या बचा पाएगा ।

मानव समाज के स्वस्थ भविष्य, और समाज में स्वस्थ राजनीति के लिए भी, मानविकी और साहित्य के विषयों को किसी भी तरह के राजनीतिक एजेंडे के प्रभावक्षेत्र से दूर रखने की ज़रूरत है। वरना, ये सारे शैक्षिक विषय, स्वतंत्र गरिमापूर्ण मानव मूल्यों से वंचित हो, अपनी सामाजिक परिवर्तनकारी क्षमताओं को खो बैठेंगे ।

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संपादक:-साकेत बिहारी।

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