उर्दू पत्रकारिता और हिन्दू-मुस्लिम एकता

पत्रकारिता का इतिहास-



इतनी बात हम सब को मालूम है कि विश्व का पहला समाचार पत्र ‘एकटा ड्यूरना’ है, जिसे 60 ईसा पूर्व में रोम के जूलियस सीजर ने अपने सीनेट के आदेशों और संदेशों के प्रसारण के लिए जारी किया था. अगर हम भारत में शुरू हुई पत्रकारिता की बात करें तो पता चलेगा कि अकबर ने सबसे पहले ‘अखबार-ए-दरबार मुअल्ला’ नाम से एक कॉलमी अखबार (हाथ से लिखा हुआ) प्रकाशित किया था, जिसमें दरबार और शाही महल की खबरें छपा करती थीं. जब यही अखबार बहादुर शाह जफर तक पहुंचा, तो ‘सिराज-उल-अखबार’ बन गया. यह फारसी भाषा में छपता था. यहाँ हम पत्रकारिता के इतिहास में बहुत पीछे तक नहीं जा सकते है.

यह इतिहास है कि उर्दू की पहला पत्रिका 1822 में ‘जाम-ए-जहाँ नुमा’ के नाम से प्रकाशित हुई थी. इसके संपादक लाला सुदा सुख लाल थे. यह उर्दू पत्रिका इतिहास का महत्त्वपूर्ण बिंदु है. इसके पहले संपादक और मालिक कोई मुसलमान नहीं था. मगर आज इसी उर्दू को मजहब के चश्मे से देखा जा रहा है.

कुछ इतिहासकारों ने यह भी लिखा है कि ‘जाम-ए-जहाँ नुमा’ उर्दू का पहला अखबार नहीं था, बल्कि ‘फौजी अखबार’ पहला अखबार है, जिसे टीपू सुल्तान ने निकला था . अगर इस अखबार को पहला उर्दू अखबार मान लिया जाए, तो यह कहना पड़ेगा कि उर्दू पत्रकारिता अठारवीं शताब्दी से जुड़ी हुई है. लेकिन आज उर्दू में यही इतिहास माना जाता है कि 1822 में प्रकाशित होने वाला ‘जाम-ए-जहाँ नुमा’ उर्दू का पहला अखबार है. यही कारण है कि 2022 में उर्दू पत्रकारिता के दो सौ साल का जश्न मनाया जा रहा है.  

शोधकर्ताओं ने 19वीं सदी में प्रकाशित करीब 500 अखबारों का खुलासा किया है. जिस प्रकार आज आरएनआई से वार्षिक समाचार पत्रों की संख्या की सूची निकलती है, उसी प्रकार उस समय की सरकारें भी समाचार पत्रों की संख्या के आधार पर वार्षिक रिपोर्ट जारी करती थीं.

19वीं शताब्दी कि फाइलों से शांति रंजन भट्टाचार्य द्वारा संकलित सूची ‘उन्नीसवीं सदी के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की संख्या’ से 500 उर्दू समाचार पत्रों का पता चलता है. भट्टाचार्य का यह लेख मासिक ‘आज कल’ उर्दू खंड संख्या 42, अंक संख्या 5-4दिसंबर 1983में प्रकाशित हुआ है.

न्नीसवीं शताब्दी के कुछ मशहूर पत्रिकाए यह हैंः दिल्ली उर्दू अखबार, सैयद अल-अखबर 1837, अखबार अल-अखयार, मुजफ्फरपुर 1968, तिलस्मे  लखनऊ 1856, सहर-ए- सामरी 1865, अखबार -ए- एजाज 1856, मखजन-उल-अखबर और अशरफ-उल-अखबार  सिराज-उल-अखबार 1841, आइना गिनी नुमा 1843, करीम-उल-अखबार 1845, जिया-उल-अखबार 1851, खबर साइंटिफिक सोसाइटी 1866, तहजीब-उल-अखलाक 1879, अवध पंच 1877, इत्यादि.

जाहिर है कि यहां विस्तार से उर्दू अखबारों का उल्लैख नहीं किया जा सकता. इसलिए केवल लोकप्रिय उर्दू अखबारों पर रौशनी डाली जाती है.  

उर्दू अखबार के इतिहास में मौलाना अबुल कलाम आजाद के अखबार अल-हिलाल और अल-बलाग का नाम बहुत महत्वपूर्ण हैं. अल-हिलाल 1912और अल- बलाग 1913में शुरू हुआ था. इन दोनों अखबारों की मदद से मौलाना ने देश की जनता को आजादी का पाठ पढ़ाया. इसलिए अंग्रेज उनके अखबारों पर प्रतिबंध लगाते थे. ये दोनों अखबार कलकत्ता से प्रकाशित होते थे. इन अखबारों के अलावा मौलाना ने अन्य अखबारों को भी अपना योगदान दिया था.

मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने ‘हमदर्द’ अखबार को कलकत्ता से प्रकाशित किया. फिर उसे दिल्ली से निकालना शुरू कर दिया गया. यही वह मौलाना थे, जो अंग्रेजी में भी ‘कामरेड’ के नाम से अखबार निकालते थे. 1914में, मौलाना ने तुर्कों पर एक लंबा लेख  लिखा, जब उनके अंग्रेजी अखबार ‘कॉमरेड’ की जमानत जब्त कर ली गई और मौलाना मुहम्मद अली जौहर और उनके भाई  मौलाना शौकत अली को नजरबंद कर दिया गया. यही कारण था कि1915में ‘हमदर्द’ को बंद करना पड़ा. फिर 1923में उनकी रिहाई के बाद हमदर्द को प्रकाशित किया जाने लगा. 1928में जब मौलाना मुहम्मद अली जौहर इलाज के लिए यूरोप गए और उनकी तबियत मुसलसल खराब रहने लगी, तो अखबार को बंद करना पड़ा.

‘जमींदार’ उर्दू का एक मशहूर अखबार था. इसके संस्थापक संपादक कवि और लेखक और मौलाना जफर अली खान थे. यह अखबार 1920 से 1940 के दशक तक भारतीय मुसलमानों और राष्ट्रवादियों मुखपत्र था. यह उर्दू जानने वालों के बीच लोकप्रिय समाचार पत्र था. इस ने उर्दू भाषा पत्रकारिता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इस का दफ्तर लाहौर में स्थित था. इस समाचार पत्र में किसानों और काश्तकारों के मुद्दे पर भी चर्चा होती थी और अंग्रेजों के खिलाफ खुलकर लिखा जाता था. इसलिए अंग्रेजों से इस अखबार पर निशाना साधा.

ऊपर की लाइनों में कुछ अखबारों का उल्लेख क्या गया है, इनके अलावा बहुत से अखबार हैं, जिन्होंने उर्दू पत्रकारिता के सफर को कामयाब बनाया है. आज भी मुल्क भर से बहुत से उर्दू के अखबार जैसे राष्टीय सहारा, इंकलाब, मुंसिफ, सियासत, अखबार मासिक, कौमी तंजीम, कश्मीर उज्मा, सालार, उर्दू टाइम्स, इत्यादि प्रकाशित हो रहे हैं.

संछेप में यही कहा जा सकता है कि उर्दू अखबारों ने शुरू से ही हिंदू-मुस्लिम एकता का सबूत पेश किया. इतिहास गवाह है कि आजादी के संघर्ष में उर्दू पत्रिकाओं और पत्रकारों ने जो भूमिका निभाई, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता. मौलवी बाकर हों कि मौलाना आजाद, मौलाना जफर अली खान हों कि मुहम्मद अली जौहर, उन सबने अपने अखबारों के मध्यम से जनता को आजादी का सपना दिखाने में अहम भूमिका निभाई है.

साथ ही ये भी अस्पष्ट होता है क कल भी बहुत से गैर मुस्लिम उर्दू अखबार निकलते थे और आज भी. आज उर्दू के बड़े-बड़े अखबारों के मालिक गैर-मुस्लिम है, अर्थात उर्दू पत्रकारिता ने हिन्दू मुस्लिम इत्तेहाद का जो सफर अपने पहले दिन से शुरू किया था, वह किसी न किसी अस्तर पर आज भी जारी है, जो उर्दू कि खूबसूरती को दर्शाता है और देश की सुंदरता को बढ़ता है.

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